'कैराना का याराना' बीजेपी के लिये बन सकता है चुनौती

AajKiDuniya 26/5/2018

  राज्य में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को शिकस्त देने वास्ते समाजवादी पार्टी ने 2 सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के साथ करार किया है। इस करार के तहत कैराना सीट से आरएलडी चुनाव लड़ेगी और यह सीट समाजवादी पार्टी ने आरएलडी के लिए छोड़ी है, जहां से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी रहीं तबस्सुम हसन अब आरएलडी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगी जबकि नूरपुर में समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार मैदान में होगा।
   
   सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला रह चुके पश्चिमी यूपी में कैराना लोकसभा व नूरपुर विधानसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में एकजुट विपक्ष से भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती है। विपक्षी एकता टूटी तो भाजपा की राह आसान हो सकती है। इन दोनों सीटों पर रालोद की भूमिका भी अहम होगी।
   सपा मुखिया अखिलेश यादव कैराना सीट को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती व रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह से मशविरा करके ही कोई फैसला करेंगे। इसमें तीन-चार दिन लग सकते हैं।
   
   कैराना व नूरपुर सीट क्रमश: 2014 व 2017 में भाजपा ने जीती थी। सांसद हुकुम सिंह और विधायक लोकेंद्र सिंह के निधन से रिक्त हुई इन सीटों पर होने वाले उपचुनाव पश्चिमी यूपी में भाजपा की लोकप्रियता के आकलन का पैमाना बनेंगे। सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन उपचुनावों में गोरखपुर व फूलपुर की तरह विपक्षी दलों में व्यापक एकता बन पाएगी या नहीं। इस इलाके की राजनीति के जानकार मानते हैं कि एकजुट विपक्ष ही भाजपा को कड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
   
   2014 में सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़े तो भाजपा के हुकुम सिंह को कैराना में 50 फीसदी से ज्यादा मत मिले। उन्हें अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से लगभग 2.37 लाख वोटों की बढ़त मिली थी। हालांकि , 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैराना संसदीय क्षेत्र में आने वाली विधानसभा की पांच में से चार सीटें जीतीं लेकिन उसके वोटों में 1.34 लाख की गिरावट आ गई थी।
   
   उस समय सपा और कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव लड़ी थी। सपा एक सीट जीती थी जबकि कांग्रेस तीन सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। एक सीट पर बसपा दूसरे नंबर पर थी।
   
   

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